"एक जमी हुई चीख़: कश्मीरी पंडितों का पलायन — देश की आत्मा पर पड़ा सबसे गहरा ज़ख़्म"
"एक जमी हुई चीख़: कश्मीरी पंडितों का पलायन — देश की आत्मा पर पड़ा सबसे गहरा ज़ख़्म" "हम लौटेंगे... पर क्या हमारी घाटी वही होगी?" यह सवाल आज भी लाखों कश्मीरी पंडितों की आंखों में तैरता है—उन आंखों में, जिन्होंने अपने जलते हुए घरों को देखा, अपने प्रियजनों की लाशों को उठाया, और अपना वजूद खोते देखा... और वो भी अपने ही देश में। 🕯 19 जनवरी 1990 – वो रात जो कभी नहीं सोई कश्मीर की वादियों में, जहाँ कभी शिव-पार्वती की कथाएँ गूंजा करती थीं, उस रात वहां गूंज रहे थे भयानक नारे: "रालिव, गालिव या चालिव" (Convert, Die or Leave) इस्लामिक कट्टरपंथियों की आवाज़ें, लाउडस्पीकरों के ज़रिए, घर-घर में आतंक बनकर गूंज रही थीं। उस रात केवल एक धर्म को चुनकर निशाना बनाया गया— हिन्दू कश्मीरी पंडित। 🔥 घर जलते रहे, इतिहास मौन रहा 4 लाख से ज़्यादा कश्मीरी पंडित अपने घर छोड़ने पर मजबूर हुए। जिस ज़मीन पर उनके पुरखों ने मंदिर बनाए, उसी ज़मीन ने उनकी चीखें भी सुनीं—लेकिन सरकारें चुप रहीं, मानवाधिकार के ठेकेदार चुप रहे, और तथाकथित सेक्युलर बुद्धिजीवी भी चुप ही रहे। 🏚 शरणार्थी ...